पश्चिम बंगाल में निपाह वायरस का फैलाव: पांच पुष्टि मामले, 100 से अधिक लोगों को क्वारंटाइन
जन॰, 28 2026
जनवरी 23, 2026 को पश्चिम बंगाल के बरासत में निपाह वायरस का एक गंभीर प्रकोप सामने आया, जिसमें पांच लोगों की पुष्टि हुई और लगभग 100 लोगों को क्वारंटाइन कर दिया गया। यह आउटब्रेक एक निजी अस्पताल से शुरू हुआ, जहां दो नर्सों ने एक मरीज की देखभाल करते समय तेज बुखार और सांस लेने में तकलीफ का सामना किया। मरीज की मौत हो गई, लेकिन उसकी मौत से पहले टेस्ट नहीं हो पाया — अब वह इस आउटब्रेक का संभावित स्रोत माना जा रहा है। यही नहीं, अब तक पांच मामले पुष्टि हो चुके हैं, और सभी एक ही अस्पताल के स्वास्थ्य कर्मचारी हैं।
एक अस्पताल में फैला वायरस: चिकित्सकों की बलि
दो नर्सों के बाद, एक डॉक्टर, एक और नर्स और एक स्वास्थ्य कर्मचारी ने भी निपाह वायरस का टेस्ट पॉजिटिव दिया। सभी को बेलेघाटा, कोलकाता के पूर्वी हिस्से में स्थित संक्रामक रोग अस्पताल में भर्ती कर लिया गया। यह बात चौंकाने वाली है — एक ही अस्पताल में पांच अलग-अलग स्वास्थ्यकर्मी संक्रमित हो गए। इसका मतलब है कि वायरस ने अस्पताल के अंदर ही एक गहरा नेटवर्क बना लिया है। इसकी वजह क्या हो सकती है? शायद रक्षा के लिए उपयोग किए जा रहे PPE गियर की कमी, या फिर इन्फेक्शन कंट्रोल प्रोटोकॉल में खामियां।
स्वास्थ्य विभाग के प्रमुख अधिकारी नारायण स्वरूप निगम ने The Telegraph को बताया कि 180 लोगों का टेस्ट किया गया है, और 20 उच्च-जोखिम वाले संपर्कों को क्वारंटाइन कर दिया गया है। सभी अस्पष्ट हैं और टेस्ट नेगेटिव आया है। लेकिन यहां एक बड़ी चिंता है — निपाह वायरस का इनक्यूबेशन पीरियड 4 से 14 दिन तक होता है, लेकिन कभी-कभी 45 दिन तक भी बढ़ जाता है। इसलिए, इन 20 लोगों को 21 दिन बाद फिर से टेस्ट किया जाएगा।
भारत भर में चेतावनी: एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम पर नजर
केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने तुरंत भारत के सभी राज्यों को एक आधिकारिक चेतावनी जारी की। इसमें कहा गया है: "पश्चिम बंगाल से यात्रा या संपर्क के इतिहास वाले एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (AES) के मरीजों को निरंतर निगरानी के अधीन रखें।" तमिलनाडु जैसे राज्य तो अब हर AES मामले को निपाह वायरस के लिए स्क्रीन कर रहे हैं।
यह बात अहम है क्योंकि निपाह वायरस के शुरुआती लक्षण — बुखार, सिरदर्द, मांसपेशियों में दर्द, थकान — बिल्कुल सामान्य बुखार जैसे लगते हैं। लेकिन 2-3 दिनों में यह दिमाग के जलन (एन्सेफलाइटिस) में बदल सकता है। रोगी भ्रम, बेहोशी, या यहां तक कि कोमा में चला जाता है। कुछ बचे हुए लोगों को सालों बाद भी दिमागी समस्याएं होती हैं।
कोई दवा नहीं, कोई टीका नहीं — सिर्फ समर्थन
यहां सबसे डरावनी बात यह है कि निपाह वायरस के लिए अभी तक कोई दवा या टीका नहीं है। इलाज सिर्फ समर्थनात्मक है — बुखार कम करना, सांस लेने में मदद करना, दिमाग के दबाव को नियंत्रित करना। इसकी मृत्यु दर 40 से 75 प्रतिशत तक होती है। कुछ पिछले प्रकोपों में यह आंकड़ा 100 प्रतिशत तक पहुंच गया।
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने इसे एक "प्राथमिक पथोजेन" के रूप में रखा है — यानी जिस पर तुरंत शोध की जरूरत है। लेकिन आज तक कोई बड़ा निवेश नहीं हुआ। अस्पतालों में बेसिक हाइजीन और संपर्क ट्रेसिंग ही एकमात्र ढाल है।
चमगादड़ों से शुरू हुआ यह तबाही
निपाह वायरस एक जूनोटिक रोग है — यानी इसका स्रोत जानवर है। यहां चमगादड़ ही मुख्य वाहक हैं। ये चमगादड़ अपने लार या मूत्र के माध्यम से फलों को संक्रमित कर देते हैं, जिन्हें बाद में इंसान या सूअर खा लेते हैं। फिर वायरस इंसानों में फैल जाता है।
भारत में यह वायरस 2001 से ही आता रहा है। पश्चिम बंगाल में 2001 और 2007 में प्रकोप हुए थे। लेकिन केरल ने इसका सबसे बड़ा बोझ उठाया है — 2018 के बाद से यहां नौ बार निपाह वायरस के प्रकोप आए हैं। हर बार यही नमूना दोहराया गया: गांव में चमगादड़ों के संपर्क में आया कोई व्यक्ति, फिर उसके संपर्क में आने वाले परिवार, फिर डॉक्टर और नर्स।
अगले कदम: जागरूकता या बर्बादी?
अब सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ आउटब्रेक के बाद ही एक्शन लेंगे, या फिर इसे रोकने के लिए पहले से तैयार होंगे? बरासत के अस्पताल में एक नर्स की मौत ने साबित कर दिया कि जब तक हम रक्षा के लिए उपकरण और प्रशिक्षण को नहीं सुधारेंगे, तब तक यह आउटब्रेक दोहराया जाएगा।
स्थानीय स्वास्थ्य अधिकारी अब चमगादड़ों के निवास स्थानों के आसपास के गांवों की निगरानी कर रहे हैं। लोगों को फलों को खाने से पहले धोने की सलाह दी जा रही है। लेकिन क्या यह काफी है? जब तक हम गांवों में स्वास्थ्य सुविधाओं को मजबूत नहीं करेंगे, तब तक यह वायरस हमेशा एक बम की तरह बना रहेगा।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
निपाह वायरस कैसे फैलता है?
निपाह वायरस मुख्य रूप से चमगादड़ों के मूत्र या लार से फैलता है, जो फलों या आंवले पर पड़ जाता है। इन फलों को खाने या उनसे बनी चूसने वाली चीजों (जैसे ताज़ा खजूर का रस) का सेवन करने से इंसान संक्रमित हो सकता है। फिर इसका फैलाव बीमार व्यक्ति के साथ घनिष्ठ संपर्क से होता है — जैसे देखभाल करने वाले चिकित्सकों को।
क्या यह वायरस इंसान से इंसान में फैलता है?
हां, यह वायरस इंसान से इंसान में फैल सकता है, खासकर जब कोई बीमार व्यक्ति के साथ घनिष्ठ संपर्क हो। यही कारण है कि अस्पतालों में नर्स और डॉक्टर अक्सर शिकार बनते हैं। पश्चिम बंगाल के इस प्रकोप में पांचों संक्रमित व्यक्ति एक ही अस्पताल के कर्मचारी थे, जिससे यह साबित होता है कि संक्रमण का रास्ता इंसान-से-इंसान है।
क्या इस वायरस के लिए टीका उपलब्ध है?
नहीं, अभी तक कोई टीका या दवा नहीं है। दुनिया भर में कई शोध संस्थान इस पर काम कर रहे हैं, लेकिन कोई भी टीका अभी तक अनुमोदित नहीं हुआ है। इलाज सिर्फ समर्थनात्मक है — बुखार कम करना, सांस लेने में मदद करना और दिमाग के दबाव को नियंत्रित करना।
इस आउटब्रेक के बाद क्या अगला कदम है?
अगले 21 दिनों में क्वारंटाइन किए गए 20 लोगों का फिर से टेस्ट किया जाएगा। इसके अलावा, बरासत के आसपास के गांवों में चमगादड़ों के निवास स्थानों की जांच की जा रही है। राज्य सरकार अस्पतालों में PPE और संक्रमण नियंत्रण प्रोटोकॉल की समीक्षा कर रही है। यही अगला बड़ा चरण है।
क्या आम आदमी को डरने की जरूरत है?
नहीं, आम आदमी के लिए खतरा बहुत कम है। अगर आप बरासत या कोलकाता के आसपास नहीं रहते, तो आपका जोखिम नगण्य है। लेकिन अगर आप बीमार व्यक्ति की देखभाल कर रहे हैं, तो दस्ताने, मास्क और हाथ धोना जरूरी है। बुखार आने पर तुरंत अस्पताल जाना चाहिए।
क्यों यह वायरस हर बार केरल और पश्चिम बंगाल में आता है?
केरल और पश्चिम बंगाल में चमगादड़ों के निवास स्थान घने हैं, और लोग ताज़े फलों या खजूर के रस का सेवन करते हैं। इन राज्यों में ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था कमजोर है, जिससे शुरुआती मामले पहचाने नहीं जाते। जब तक इन इलाकों में जागरूकता और स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा मजबूत नहीं होगा, तब तक यह चक्र जारी रहेगा।
